गुरुवार, 21 मई 2020

औकात- एक प्रेरणादायी कथा

सुरेखा की शहर के बीचों-बीच कपड़ें की बहुत बड़ी दुकान थी। हर तरह की महंगी साड़ियां और सलवार कमीज के कपड़ें वहां मिलते थे। अच्छी ख़ासी आमदानी होती थी उसकी। क्योंकि अकेले दुकान संभालना मुश्किल था तो उसने कांता को अपनी दुकान पर काम करने के लिए रख लिया। कांता को उसके काम के लिए पूरे 2000 हजार रुपए मिला करते थे। अपने घर के काम निपटाकर वो ठीक सुबह 9 बजे दुकान पर पहुंच जाया करती थी और रात 8 बजे तक पूरे मन से दुकान पर काम किया करती थी, ग्राहकों को बहुत सारे कपड़े दिखाने की जिद खुशी खुशी पूरा कर दिया करती। उसके पति एक कारखाने में काम करते थे लेकिन उनकी तनख़्वाह में घर खर्च चलाना मुश्किल था तो वो सुरेखा के यहां काम करने लगी।

 

कई बार ग्राहक कपड़ें खरीदते भी नहीं और उसे सारे कपड़ों की घड़ी खुद करनी पड़ती और उन्हें पैक करके रखना पड़ता था। उसकी उपस्थिती में सुरेखा को भी बहुत ज्यादा चिंता नहीं होती थी वो सिर्फ मेन काउंटर पर बिलिंग का काम करती या फिर ग्राहकों से मोल भाव का काम करती थी।

सुरेखा के पति दुबई में काम करते थे ऐसे में दुकान संभालने की सारी जिम्मेदारी सुरेखा पर ही आ गई थी। एक दिन सुरेखा की बेटी घर ना जाकर सीधे दुकान पर आ गई क्योंकि सुरेखा उसके बैग में घर की अतिरिक्त चाबी रखना भूल गई। कांता सुरेखा की बेटी से बहुत प्यार से बात करने लगी और सुरेखा की बेटी ने भी उसको अपने बैग से निकालकर चॉकलेट खाने के लिए दी।

तभी सुरेखा की बेटी ने कांता से पूछा आपके बच्चे कौन से स्कूल में पढ़ते है?

तब जवाब में कांता ने कहा मेरी एक ही बेटी है जो कि पास के ही सरकारी स्कूल में पढ़ती है क्लॉस 8 में

सुरेखा की बेटी ने कहा मतलब वो मेरी ही उम्र की है मैं इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ती हूं जो कि शहर का नंबर वन स्कूल है। आप भी उसे मेरे स्कूल में डाल दो वो काफी इन्टेलिजेन्ट हो जाएगी

इससे पहले की कांता कुछ जवाब दे पाती सुरेखा ने अपनी बेटी को बीच में ही टोक दिया जिसकी जिसकी जितनी फ़ीस खर्च करने की औकात होती है वो उस स्कूल में अपने बच्चों को डालता है, तू ज्यादा ज्ञान मत झाड़

हालांकि सुरेखा का इरादा कांता को नीचा दिखाने का नहीं था लेकिन अंजाने में कही गई उसकी बात कांता के मन को लग गई, लेकिन वो चुप ही रही।

दो महीने बाद एक दिन सुरेखा ने कांता को चाय नाश्ता कराया और मिठाई खिलाई तो कांता ने पूछा इस मेहरबानी की वजह?”

तो सुरेखा ने बताया की उसकी बेटी ने पूरे स्कूल में टॉप किया है।

कांता ने कहा बधाई हो मैडम

 वो आगे बोली आज मैं भी आप का मुंह मीठा करना चाहती हूं

सुरेखा ने कहा "क्यों" ?

कांता ने कहा मेरी बेटी ने पूरे जिले में पहला नंबर पाया है

 सुरेखा ने कहा बधाई

असल में वो अंदर से बेहद नाख़ुश थी क्योंकि कांता की बेटी की उपलब्धि उसकी बेटी से बहुत बड़ी थी।

आज उसे अपने कहे शब्दों का बड़ा पछतावा हुआ लेकिन वो बयां नहीं कर पा रही थी, आज उसे अपनी ही औकात बहुत मामुली जो लग रही थी।

शिल्पा रोंघे

 

© सर्वाधिकार सुरक्षित, कहानी के सभी पात्र काल्पनिक है जिसका जीवित या मृत व्यक्ति

से कोई संबंध नहीं है।



 

मंगलवार, 19 मई 2020

मायानगरी के सपनें

 


सचिन को सुबह-सुबह उसके दोस्त का फ़ोन आया वो कहने लगा “अरे वाह तूने तो सच में शहर का नाम रोशन कर दिया”

सचिन ने कहा अरे क्या हुआ ऐसा

नवनीत ने कहा “तेरा इंटरव्यू छपा था जबलपुर के एक अखबार में”

सचिन ने कहा ओह उसकी बात कर रहा है तू

हेडलाईन छपी शहर की प्रतिभा ने मायानगरी में बनाई पहचान, मिला एक फ़िल्म में काम

सचिन उसकी बात से कुछ खास  खुश नहीं हुआ क्योंकि 3 साल के स्ट्रगल के बाद भी उसे  ऐसा रोल मिला जिसकी अवधि मुश्किल से 5 मिनिट रही होगी। इससे पहले वो दो तीन एड फ़िल्म में ही काम कर चुका था, इतने सालों में  उसने  एक दो लाख से ज्यादा नहीं कमाए थे।

फ़ोन पर बातचीत ख़त्म होते ही वो फ़्लैशबैक में चला गया कि कैसे मुंबई के एक पॉश इलाके में वो बड़े- बड़े सपने लेकर आया था, स्कूल और कॉलेज में वो कई डॉसिंग और मॉडलिंग कॉम्पीटिशन जीत चुका था, देखने में भी खूबसूरत था और कद काठी भी अच्छी थी, बीकॉम पूरा करने के बाद सीए के लिए भी ट्राय किया लेकिन इंटरमिडियट लेवल पूरा करने के बाद भी आगे उसका पढ़ाई में मन नहीं लगा और वो मायानगरी में हीरो बनने का ख़्वाब अपनी आंखों में बसाकर चला आया।

 

एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो के चक्कर काटना बस यही उसकी ज़िंदगी हो गई थी अब तक करीब 300 ऑडिशन दे चुका था लेकिन वो कामयाबी नहीं मिली जो वो चाहता था।

यहां आकार देखा कि उसके जैसे हजारों खूबसूरत नौजवान स्ट्रगल कर रहे है, जैसे कि उसका कोई अस्तित्व ही ना हो।

उसके पिता प्राईवेट कंपनी में इंजिनियर थे उसकी तीन बहनें थी, दो की शादी हो चुकी थी  और एक पढ़ाई कर रही थी, सचिन के पिता पहले उसके इस फ़ैसले के लिए तैयार नहीं थे लेकिन वो जिद पर अड़ा रहा, कुछ एक्टिंग के कोर्स भी किए जहां उसका काफी पैसा खर्च हुआ उसकी एक्टिंग में तो निखार आ गया लेकिन फिर उसके पास काम का अकाल था।

उसके पिता हर महीने उसके अकाउंट में करीब 10-15 हजार डाल देते थे जिससे उसका खर्चा- पानी निकल जाए लेकिन मायानगरी में सिर्फ खर्चा पानी से कहां काम चलता है लाइफ़स्टाइल भी तो मेन्टेन करना पड़ता है।

महंगे- महंगे कपड़ें और उसके दोस्तों की पार्टियों के बीच उसकी स्थिती आमदनी अठन्नी और खर्चा रुप्पया वाली हो गई थी।

उपर से तो वो खुद को बेहद खुश दिखाता लेकिन अंदर ही अंदर घुट रहा था, उसके पिता भी फ़ोन पर उसे वापस आने की ज़िद करते थे और एक दिन फ़ोन करके कहा तुम पढ़ाई में इतने अच्छे हो तो क्यों नहीं अपने सीए का फ़ायनल राउंड भी कंपलीट करने के लिए प्रयास करो। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद फिर मुंबई चले जाना मैं तुमको रोकूंगा नहीं

लेकिन सचिन का मन नहीं कर रहा था कि वो वापस आए लेकिन एक दिन उसे ख़बर आई कि उसके पिता का हार्ट अटैक से निधन हो गया।

अब मां और बहन की जिम्मेदारी सचिन पर ही थी तब उसके मन में ख़्याल आया कि इतना स्वार्थी होना भी ठीक नहीं है अपने पिता को अग्नी देने के बाद वो जबलपुर से मुंबई लौटा ही नहीं और अपनी पढ़ाई पूरा करने में जी जान से जुट गया और कुछ साल मेहनत करने  के बाद सीए का एक्ज़ाम पूरी तरह क्लीयर कर लिया। अपने आप को बदनसीब समझने वाला सचिन अब खुद को भाग्यशाली समझने लगा।

 

शिल्पा रोंघे

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सोमवार, 18 मई 2020

देवी का आभास




35 साल की वो औरत माथे पर बड़ा सा तिलक, आंखों में गहरा काजल लगाकर अपने लंबे केश लहराने लगी।

हां मुझे महसूस हो रही है, हां मेरे शरीर में उसका प्रवेश हो चुका है....हां उसकी उपस्थिती मुझे महसूस हो रही है...जय मां...जय मां... मनोरमा ऐसा कहने लगी।

अपने मिट्टी से बने कमरें में लकड़ी के पटिए पर उसने कुछ देवी के चित्र लगा रखे थे। धूप, कपूर और अगरबत्ती की सुंगध से सारा वातावरण महकने लगा।

गेंदे और सफेद पुष्पों को अर्पित करने के बाद वो बोली बोल बच्चा क्या जानना चाहता है तू ?”

15 साल का दुबला पतला मरियल सा लड़का बोला हमेशा बीमार रहता हूं, दवा भी ठीक से नहीं लगती है सिर दर्द से परेशान रहता हूं

आंखे बंद करके मनोरमा ने जवाब दिया आज से ठीक 4 महीने बाद जैसे बाढ़ के पानी का स्तर धीरे धीरे उतरता है वैसे ही ये भी मंद गति से ही जाएगा

धन्यवाद देवी मां कहते हुए 300 रुपए और एक मिठाई का डिब्बा वो लड़का उसके हाथों में देकर चलता बना।

 

फिर वहां 60 साल की बूढ़ी औरत आई बोली प्रणाम माता रानी मेरी बहू और मेरा हमेशा झगड़ा होता रहता है, कहती है अलग रहूंगी पति को लेकर, मान ही नहीं रही है, क्या करुं

फिर आंखे बंद करके मनोरमा बोली किसी ने जादू टोना कर दिया है तेरे घर पर इसलिए दशा बिगड़ गई है

जा ये नारियल अपने देवघर में रख आ सब ठीक हो जाएगा और जुबां पर काबू रखा कर, 10 दिन मौन व्रत रख

जानकी भी अपने बेटे को लेकर वहां पहुंच गई जो शहर से बीई करके लौटा था

बोली बहुत मेहनत करता है कहीं नौकरी नहीं लग रही

ये ले लाल धागा इसकी कलाई पर बांध दे दो महीने के अंदर काम हो जाएगा

जानकी ने अपनी  बटुए 500  रुपए निकल कर उसके हाथ में रख दिए।

मनोरमा की 16 साल की उम्र में शादी हो गई थी बस आठवी तक ही पढ़ पाई, पति खेती किसानी करता लेकिन थोड़ी सी जमीन में भरण पोषण ना होता था, इसी बीच उसके दो लड़के और एक लड़की हो गई।

कोई मिडिल तो कोई हाईस्कूल में पढ़ रहा था। अचानक लंबी बीमारी के बाद उसके पति की मौत हो गई इलाज में जो थोड़ी बहुत जमीन  थी भी बिक गई, रिश्तेदारों भी कहां तक साथ देते बच्चों की पढ़ाई तो क्या रोजी रोटी के तक लाले पड़ने लगे।

थक हार की मनोरमा ने खूब आराधना शुरु कर दी की, कुछ तो कृपा हो ईश्वर की। समस्याएं तो दूर नहीं हुई उसे आभास होने लगा की देवी उसके शरीर में आती है तो फिर क्या था बात सारे गांव में फ़ैल गई और लोग उसके पास अपनी समस्याएं लेकर आने लगे ज्यादातर लोग की मनोकामना पूरी भी होने लगी थी जिसकी वजह से लोगों का विश्वास उस पर बढ़ने लगा।

दरअसल जो लोग उसके पास आते उनमें इच्छाशक्ति का आभाव था और वो उसकी बातों पर अंधा विश्वास करने लगे थे जिनसे सिर्फ उनका खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आता था।

मुश्किल हालतों से जूझ रही मनोरमा खुद भी ये समझ पाने में असमर्थ थी कि ये सिर्फ उसके मन का वहम है कि उसके शरीर में देवी आती है, असर तो सिर्फ लोगों पर उसकी दी गई सहानुभूति का हो रहा था जो अक्सर थके- हारे लोगों को इस दुनिया में नहीं मिल पाती है।

शिल्पा रोंघे

 

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रविवार, 17 मई 2020

संगत का असर


आज मनोहर घर आया तो उसकी मां उसे देखकर हक्की बक्की रह गई, चेहरे की हवाईयां उड़ी हुई और कपड़ों पर मिट्टी और धूल के धब्बे  ऐसे प्रतीत हो रहे थे कि मानो मिट्टी में लोट कर आया हो।

तब उसकी मां ने पूछा बेटा ये क्या हालत बना रखी है?”

मनोहर कॉलेज से लौटा था उसने सोचा अगर सच बताया तो शायद उसकी मां नाराज़ होगी और बिना कोई सफाई दिए वो नहाने चला गया और अपने कमरे में लेट गया।

काफी देर तक सोते देख उसकी मां ने कहा आज इतनी थकान क्यों हो रही है तुम्हें?”

मनोहर ने कहा अब शायद सब कुछ साफ साफ बता देना ही ठीक रहेगा।

मां मैं अपने दोस्त मंदार के यहां कॉलेज के खत्म होने के बाद उसके रुम पर हालचाल पूछने गया क्योंकि वो कॉलेज नहीं आया था दो तीन दिन से। तब देखा कि वो शराब के नशे में धुत था। उसने मुझे कहा चल ना यार क्या पढ़ाई वढ़ाई के पीछे लगा रहता है तू आज फ़िल्म देखकर आते है उसने जिद की, कि मेरी बाईक वही चलाएगा लेकिन मैंने कहा कि नशे में ड्राईव करना सही नहीं है, लेकिन वो नहीं माना और जबर्दस्ती  मुझे पीछे बिठाकर बाईक चलाने लगा वो भी फुल स्पीड पर, मुझे लगा ही की आज कोई अनहोनी होने वाली है और उसने एक बाईक को टक्कर मार दी फिर क्या उस पर बैठे दो हट्टे कट्टे आदमी गिर गए। मैंने सॉरी कहने की कोशिश भी की लेकिन उन्होंने हमें दो चार थप्पड़ देकर ज़मीन पर गिरा दिया मंदार नशे में धुत था तो अपने आप को संभाल ही नहीं पा रहा था, क्योंकि ये हादसा सिग्नल के थोड़ी ही दूर हुआ था तो ट्रैफ़िक पुलिस वालों ने आकार उन लोगों को समझा कर शांत किया और हमें भी कम से कम एक घंटे लेक्चर सुनाया,  मंदार के मुहं से शराब की  बू आ रही थी, ये देखकर वो और ज्यादा चिढ़ गए और कहने लगे अपने माता पिता को फोन कर बुलाओ, मैंने जैसे तैसे मामला शांत किया ये कहकर की उसकी मानसिक हालत ठीक नहीं है और किसी तरह बाईक पर मनोज को उसके कमरे पर छोड़कर आया। मां इस तरह मेरी हालत होगी मैंने कभी सोचा ही नहीं था मनोज की वजह से मुझे कितनी बेइज्जती झेलनी पड़ी

मनोहर की मां ने कहा देखो बेटा तुमने वो तो कहानी सुनी ही होगी जिसमें कहा गया है कि सड़े हुए सेब के बगल में अगर अच्छा सेब रख दो तो वो भी सड़ जाता है। बुरी संगत के वजह से हमारी भी छवि खराब हो जाती है तुम अपने दोस्त को अपने हाल पर छोड़ दो। उसे बदलना होगा तो वो खुद ही बदल जाएगा। अगर किसी और के कर्मों के भागीदार बनोगे तो सजा तो तुम्हें भी भुगतनी ही होगी

मनोहर ने कहा “आप सही कह रही हो, गलती तो मुझसे भी हुई चाहे वो अंजाने में ही क्यों ना हो”।

शिल्पा रोंघे

 

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शनिवार, 16 मई 2020

औरत का किरदार






अपने स्टील के डब्बे में रखे कुछ गुलाब जामुन में से एक को निकालकर प्रीति ने अनिमेष के हाथ में जबर्दस्ती थमा दिया। उसके बाद अपने दो साल के बच्चें को खिलाने के बाद अपने पति के जबरन मुंह में ठूंस दिया। ऐसी मिठाई खाकर भी ख़ुश नहीं महसूस कर रहा था अनिमेष उसका अतीत जो उसके सामने बैठा था। पांच साल पहले की ही तो बात है जब अनिमेष और प्रीति एक ही कॉलेज में कम्पयूटर साइंस में स्नाकोत्तर की पढ़ाई कर रहे थे, प्रीति उसकी जूनियर थी लेकिन पढ़ाई में सामान्य और अनिमेष काफी तेज था, प्रीति हमेशा उससे नोट्स मांगती रहती थी और वो मना भी नहीं कर पाता था। प्रीति  करीब पांच फीट दो इंच के कद वाली खूबसूरत गेंहूए रंग की लड़की थी बाकि लड़कियों की तरह उसे मेक-अप करना पसंद नहीं था और फ़ैशन सेंस भी कुछ ख़ास नहीं था हमेशा सलवार कमीज या सिंपल जीन्स पहनकर कॉलेज जाती थी। अनिमेष भी गेहूंए रंग का करीब का मध्यम कद का बेहद खूबसूरत नौजवान था कई लड़कियां उस पर मरती थी चाहे मुहल्ले की हो या कॉलेज की, लेकिन उसकी रुची तो अपनी पढ़ाई में ही थी, घर में दबाव जो था कि अच्छी से अच्छी जगह कैम्पस प्लेसमेंट पाकर दिखाने का। प्रीति का धीरे -धीरे कब अनिमेष को पसंद करने लगी उसे पता ही नहीं चला, अब वो बिना वजह ही इंटरवल में आकर उससे बात करने लगी, अनिमेष के दिल में भी उसके लिए हल्का फुल्का झुकाव था लेकिन उसने ज़ाहिर नहीं किया उसके उदासीनता भरे व्यवहार को देखकर प्रीति ने भी उससे बात करना कम कर दिया। अनिमेष अभी सिर्फ अपने करियर पर ध्यान देना चाहता था उसे लगा कि प्यार और शादी ये तो बहुत दूर की बात है। एक दिन अनिमेष का कैंपस प्लेसमेंट हो गया और उसकी पुणे की एक कंपनी उसकी जॉब लग गई। धीरे धीरे उसके लिए रिश्ते आने लगे। उसकी मां चाहती थी कि किसी गोरी चिट्टी खूबसूरत और प्रतिष्ठित घर की पढ़ी- लिखी लड़की से उसका रिश्ता तय हो जाए तो उसे कई तस्वीरें भेजती रहती, अनिमेष भी इन तस्वीरों में उलझा रहता पर पता नहीं क्यों उसके दिल कोई भा ही नहीं रही थी किसी से मन नहीं मिलता तो किसी से मिज़ाज  इन्ही उलझनों के बीच वो प्रीति को बिल्कुल भूल गया।

एक दिन वो अपने माता पिता के घर उनसे मिलने नागपुर पहुंचा और दो तीन दिन वहां रहने के बाद पुणे वापस जाने के लिए स्टेशन की ओर निकला। ठीक 9 बजे पुणे से नागपुर जाने वाली गाड़ी का इंतज़ार करने लगा और 10 मिनिट बाद ट्रेन आ गई और वो उसमें अपनी सीट ढूंढने लगा और 7 नबंर की बर्थ पर बैठ गया। आज अचानक उसने देखा कि ट्रेन के एसी कोच में प्रीति उसके सामने बैठी थी जिसे उसने कभी याद ही नहीं किया लेकिन पता नहीं क्यों उसे विवाहिता के रुप में देखकर उसे बुरा लगा।

प्रीति ने भी कई जगह जॉब की कोशिश की लेकिन उसे नहीं मिल पाई और उसके लिए पुणे के ही एक इंजिनियर का रिश्ता आ गया जो कि उससे 4 साल बड़ा था, जो गोरे रंग का एक मध्यम कद काठी और सामान्य नैन नक्श वाला लड़का था।

प्रीति तब शादी नहीं करना चाहती थी लेकिन उसके रिश्तेदार उसके घरवालों पर दबाव बनाने लगे कि घर आए रिश्ते को ठुकराओं मत। कहने लगे वो कोई अप्सरा थोड़े ही है जो ज़िंदगी भर लड़कों की लाईन लगी रहेगी। प्रीति की शादी को 4 साल हो चुके थे। प्रीति अपने पति के साथ बेहद ख़ुश थी और उसने अपने पति से अनिमेष का परिचय कराया

“  ये मेरे सीनियर है इनकी मदद के बगैर मेरा पास होना भी मुश्किल था, पुणे में ही रहते है

प्रीति के पति ने कहा कभी आइए हमारे घर

अनिमेष ने भी हां में जवाब दिया दोनों में 10-15 मिनिट बातें हुई और गाड़ी पुणे स्टेशन पर आ ठहरी।

प्रीति और उसके पति ने अनिमेष को अलविदा कहा और अपने अपने रास्ते निकल पड़े।

अनिमेष भी सोच रहा था हमारे समाज में औरत का किरदार समझना वाकई मुश्किल काम होता है। दूसरों की ख़ुशी में ही उसे अपनी ख़ुशी समझनी पड़ती है। शायद वो पानी सी ही होती है जिस बर्तन में ढालो ढल जाती है।

शिल्पा रोंघे



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प्रेम का आखिरी पड़ाव




शशांक ने कहा हैलो स्मिता मैं बैंगलुरु पहुंच गया हूं। यहां की एक फ़ार्मा कपंनी में मैनेज़र के तौर पर मेरा प्रमोशन हो गया है, 30 साल का हो गया हूं। कोई अच्छी सी लड़की बताओं ना बिल्कुल तुम्हारी तरह

मैं क्या कोई फ़ोटोकॉपी मशीन हूं, जो मेरी तरह लड़की चाहिए तुमको, बहरहाल मुझसे कई गुना अच्छी लड़की मिल जाएगी तुमको और बताओं क्या हाल है तुम्हारा?”  स्मिता ने ये कहकर फिर बात को टाल दिया, वो जानती थी कि शंशाक शायद उसके जैसी लड़की की नहीं, उसकी ही बात कर रहा है लेकिन वो सिर्फ उसे अपना अच्छा दोस्त ही मानती थी और सोचती थी दोस्ती में अगर प्यार व्यार की बात आ जाए तो कभी कभी ना दोस्ती रहती है, ना प्यार। तो दोस्ती को दोस्ती ही रहने दो।

शशांक उसके घर की बिल्डिंग में सबसे उपर वाले फ्लैट में रहता था क्योंकि उसकी तनख़्वाह अच्छी ख़ासी थी तो वो अकेले ही फ्लैट लेकर रह रहा था।

वहीं 26 साल की मध्यम कद, छरहरी काया और बड़ी बड़ी आंखों वाली सांवले रंग की सुंदर सी लड़की स्मिता ने डिजिटल मार्केटिंग ट्रेनी की तरह अपने करियर की शुरुआत की थी, उसके लिए पुणे जैसे शहर में महंगा फ्लैट ले पाना बहुत मुश्किल था तो वो दो तीन लड़कियों के साथ रह रही थी।

दोनों एक दूसरे से कभी नहीं मिले और एक दिन स्मिता के फ्लैट का फ्यूज़ उड़ गया अब सबने सोचा किसे बुलाए रात के 10 बजे, स्मिता ने सकुचाते हुए अपने से दो माले उपर रहने वाले शशांक के फ्लैट पर दरवाजा खटखटाया सोचा बाकी फ्लैट में रहने वाली लड़कियां पता नहीं ये काम कर पाएं या भी नहीं शशांक ने दरवाजा खोला एक 5 फीट दस इंच का मध्यम काठी आदमी उसके सामने था जिसका रंग गेंहूआ और बाल घुंघराले थे नैन नक्श कुछ ख़ास नहीं थे लेकिन गालों पर पड़ने वाले डिंपल ने उसके चेहरे को ख़ास बना दिया था।

शशांक ने कहा क्या बात है इतनी रात को?

स्मिता जी हमारे घर का फ्यूज़ उड़ गया है

शशांक ने कहा मैं मदद कर सकता हूं

स्मिता तो यही चाहती थी, थोड़ी देर में शशांक ने उसके घर का फ्यूज़ ठीक कर दिया।

और जल्दी ही टाटा बॉय बॉय कह कर चला गया, उस वक्त ना स्मिता ने उसमें रुचि ली ना शंशाक ने ।

शशांक और स्मिता में बिल्डिंग की सीढ़ियों पर हाय हैलो ज़रुर होती थी।

दोनों ने सोसायटी का वाट्स अप ग्रुप भी ज्वाईन कर लिया।

शशांक के घर एक सुनहरे बालों वाली एक गोरी चिट्टी लड़की आया करती थी, उसे पीला रंग बहुत पसंद था अक्सर पीले सूट या पीली शर्ट पहने रहती थी शायद शशांक की ही कंपनी में काम करती थी।

स्मिता ने भी सोचा उसे भी शशांक के निजी जीवन से क्या लेना देना, तो उसने पूछा भी नहीं। एक दिन शशांक का ट्रांसफर हो गया और स्मिता के ऑफिस से आने से पहले ही वो बैंगलुरु के लिए निकल गया।

15 दिन बाद आए शशांक ने स्मिता को फ़ोन पर हाय हैलो करना शुरु कर दिया और बातों ही बातों में बता दिया कि वो पीले रंग की ड्रेस वाली लड़की उसकी गर्लफ्रेंड ही थी जिसने कंपनी के ही एक अधिकारी जो कि उससे पद में काफी उंचे ओहदे पर थे, से शादी कर ली है उसका दिल बहुत टूट गया है और रिश्तों से भरोसा भी उठ गया है, और वो अब प्यार व्यार के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता है।

स्मिता ने भी उससे सहानुभूति व्यक्त की, धीरे- धीरे शशांक के कॉल आने बढ़ गए और उसका स्मिता से दोस्ती से ज्यादा लगाव हो गया, वो उसे बिल्कुल अपनी मां की तरह लगती थी, ऐसा उसने कहा भी। उसके सहज व्यक्तित्व से वो काफी प्रभावित था।

स्मिता को भी लगने लगा कहीं वो उसे पसंद तो नहीं करता तो वो उसकी बातों को हंसकर टाल जाती, वो इन भावनाओं को मित्रता की सीमा से आगे नहीं ले जाना चाहती थी।

एक दिन शशांक के फोन भी आने बंद हो गए उसे लगा कि शायद स्मिता उसे नज़रअंदाज़ कर रही है ऐसे में उसे  फोन करके परेशान करना सही नहीं है।

ऐसा दो साल तक चला। एक दिन शशांक ने स्मिता को फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी तो पता चला कि स्मिता ने बैंगलुरु की ही एक कंपनी ज्वाइन कर ली। स्मिता से चैट करते- करते बातों बातों में ही शंशाक ने उसे कॉफी पर आने का न्यौता दे डाला और स्मिता मना नहीं कर पाई।

शशांक ने कई दिनों से स्मिता को तो कॉल नहीं किया लेकिन उसकी दोस्त से सपंर्क में था जिसने बताया कि वो समीर नाम के पियानों टीचर को डेट कर रही है और रिश्ते को आगे ले जाना चाहती है लेकिन घर के लोग इस रिश्ते को स्वीकार करेंगे या नहीं इस उलझन में है, क्योंकि वो बिल्कुल ही अलग संस्कृति का था और स्वभाव में भी उससे बिल्कुल जुदा था कहते भी तो है अपोजिट एक्ट्रेक्ट इच अदर। इस बात को कई महीने बीत चुके थे। समीर मध्यम कद काठी का गौर वर्ण वाला और सौम्य मुस्कान और चमकदार आंखो वाला आकर्षक व्यक्ति था।

एक दिन दोनों कॉफी शॉप में मिले। शशांक ने सोचा वो बहुत ख़ुश होगी पर ये क्या, उसका चेहरे की चमक ही उड़ गई थी पहले से काफी दुबली हो चुकी थी उसने सोचा शायद प्रमोशन के साथ काम का बोझ भी बढ़ गया होगा।

स्मिता से शशांक ने पूछा "शादी कब कर रही हो अपने बॉयफ्रेंड से, मुझसे प्लीज़ कुछ मत छिपाओ मैनें भी तो तुम्हें अपना हमराज़ बनाया है, जब मैं पुणें में रहता था, तो समीर से मैं भी पियानो सीख चुका हूं काफी रईस घर का है वो अब तुम रानी बनकर रहोगी। घर वालों की चिंता मत करो मैं तुम्हारा गवाह बनूंगा कोर्ट में, चलो आज तुम मुझे इस ख़ुशी में मिठाई खिलाओ मुझे सब पता चल चुका है"।

स्मिता ने कहा "ऐसा कुछ भी नहीं जो तुम सोच रहे हो, मैंने बीच में ही उसकी पियानो क्लॉस छोड़ दी है तीन महीने भी पूरे नहीं हो पाए"।

"चलो कोई बात नहीं अब तो जीवन भर पियानो सीखना है तुम्हें क्लॉस क्या घर में ही सीख लेना"।

स्मिता अंतर्मुखी स्वभाव की थी अपनी बात अपने तक रखती थी लेकिन शशांक से कुछ छिपाना उसे ठीक नहीं लगा।

उसने बताया कि समीर मारिया नाम की एक लड़की के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहता था और ये बात उसने उससे छिपाई। उसकी मीठी मीठी बातों में आकर  स्मिता ने कुछ जानने की कोशिश भी नहीं की और एक दिन समीर ने पियानो क्लॉस खत्म होते ही उसे अपनी गर्लफ्रेंड बनने के लिए प्रपोज़ कर दिया।

स्मिता भी ना नुकूर करती रही लेकिन उस दिन उसने समीर से सोचने के लिए वक्त मांगा लेकिन वो सचमुच समीर को काफी पसंद करने लगी थी, समीर भी ये जान चुका था कि वो उसे लेकर काफी सीरियस हो चुकी है।

एक दिन स्मिता समीर को सरप्राईज़ देने के लिए उसके फ्लैट पर जा पहुंची, पर ये क्या दरवाजा एक लड़की ने खोला एक बेहद गोरे रंग की भूरे आंखों खूबसूरत वाली लड़की उसके फ्लैट से निकली उसने स्मिता से पूछा कि क्या काम है उसे, समीर अभी बहार गया है

समीर के फ्लैट पर लड़की को देखकर स्मिता चौंक गई उसने पूछा आप कौन तो वो बोली "मारिया' मैं उसकी लिव इन पार्टनर हूं

स्मिता ने कहा वो उसकी स्टूडेंट है उसका कुछ सामान क्लॉस में छूट गया था, लगा कि शायद समीर घर ले आया हो।

मारिया ने कहा तुम्हारा नाम ?”

तो  स्मिता ने कहा मैं कल क्लॉस में ही मिल लूंगी उसकी बात टालकर निकल गई।

समीर की इस बात से स्मिता को काफी दुख हुआ और उसने क्लॉस जाना बंद कर दिया और एक दो बार समीर ने उसे क्लॉस आने को कहा भी लेकिन वो नहीं गई और उसकी नाराजगी की वजह भी नहीं बताई। समीर को इस बात कुछ ख़ास फ़र्क पड़ा भी नहीं मारिया के पहले भी वो कई लड़कियों को डेट कर चुका था।

दरअसल स्मिता उसे पूरी तरह समझी ही नहीं, समीर ने संघर्ष नाम की चीज़ अपने जीवन में नहीं देखी थी, इकलौता बेटा होने की वजह से उसकी हर ज़िद उसके माता पिता पूरी कर देते थे शायद इसी वजह से उसे अपने जीवन में प्यार की कमी खली नहीं। लड़कियां खुद उसकी जिंदगी में आती और अपना मतलब पूरा करके निकल जाती और वो ये बात समझ भी नहीं पाता था क्योंकि एक टूटे रिश्ते के बाद कोई और उसके पास आ जाती थी।

शशांक ने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया था उसके पिता की नौकरी में पढ़ाई का खर्चा संभव नहीं था ऐसे में उसने खुद लोन लेकर दिन रात मेहनत करके अपने ज़िंदगी बनाई थी, साथ ही वो घर में बड़ा भी था और उसके छोटे भाई की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी उसने ले रखी थी, रिश्तों की टूटन और ज़िंदगी की कड़वी सच्चाईयों से वो वाकिफ़ था।

समीर ने स्मिता ने सहानुभूति व्यक्त की और फिर वही बात दोहराई कि जो उसने फ़ोन पर दो साल पहले कही थी। स्मिता ने सीधे सीधे मना करने के बजाए कुछ वक्त मांगा ताकि शशांक को बुरा ना लगे।

शशांक ने भी उसे फ़ोन नहीं किया लेकिन कुछ दिनों में स्मिता को ये लगने लगा कि शायद उसे जीवनसाथी के तौर पर कोई ना कोई मिल ही जाएगा लेकिन ज़रुरी नहीं कि वो शंशाक की तरह समझदार और उसे समझने वाला हो। शायद वही उसके प्रेम का आखिरी पड़ाव है।

एक महीना बीत जाने के बात शशांक ने ये उम्मीद छोड़ दी थी कि स्मिता उसकी बात मानेगी। तभी वो अचानक अपने घर चला गया और घरवालों के दिखाए हुए रिश्ते देखने लगा, तभी स्मिता का मैसेज आ गया कि वो उसका साथ जीवन भर के लिए चाहती है।

तभी शशांक की मां ने आवाज़ लगाई कहा बोल दूं लड़की वालों को कि जो लड़की तुमने कल देखी थी वो तुम्हे पसंद है

तभी उसकी मां चौंक गई और कहने लगी अरे कल ही तो कहा था कि पसंद है अब क्या हुआ? आजकल के लड़के भी ना कब पलट जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है।"

तो वही अपनी मां की बातों को अनसुना कर शशांक मन ही मन खुश हो रहा था और वापस बैंगलुरु जाने के लिए बेताब था।

शिल्पा रोंघे

© सर्वाधिकार सुरक्षित, कहानी के सभी पात्र काल्पनिक है जिसका जीवित या मृत व्यक्ति

से कोई संबंध नहीं है।



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